
निर्वाण की उँगलियाँ तिया के गालों पर अभी भी काँप रही थीं। उसकी साँसें अनियमित थीं। तिया के सवाल का जवाब देने के बजाय उसने फिर से झुककर उसके होंठों को अपने होठों में पकड़ लिया।
इस बार किस्स धीमा नहीं था। उसमें भूख थी, डर था और एक बेक़ाबू चाहत जिसे महसूस कर तिया की साँस अटक गई। निर्वाण के होंठ उसके होंठों को चूस रहे थे, जीभ से उसके होंठों को सहला रहे थे।






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